मेरे कुछ मिञ मुझसे रूष्ट हैं उन्हें लगता हैं मेरी सोच में गंदगी भरी हैं यह विचार मित्रों के मन में मेरी कुछ पोस्ट को लेकर उत्पन्न हुए हैं मैं सिर्फ अपनी सफाई में इतना कहना चाहूंगा>> मैं कबूतर नहीं हैं जो बिल्ली ( मेरा अभिप्राय कुछ कटुता भरी सच्चाई से हैं ) को देखकर अपनी आँखे बंद करके खुद को सन्तुष्टि देता रहूं कि बिल्ली मेरे सामने नहीं हैं
मैंने आज की मानवीय सोच पर प्रहार किया हैं उस दोमुंही नीति पर प्रहार किया हैं जो लगातार हमारे सांस्कृतिक धरोहर को दीमक की तरह धीरे धीरे गला रही हैं। मुझे आश्चर्य होता हैं यदि मैं समाज में व्याप्त किसी मुद्दे पर व्यंग्य करता हूँ तो मेरे दिमाग की गंदगी नजर आती हैं
मैं कोई साहित्यिक साहित्यकार नहीं हूँ जो सिर्फ अच्छी बातों पर अपना ध्यान केन्द्रित किए रहूँ । मैं समाज की जमीन से जुड़ा साधारण विचारक हूँ जो देखता हूँ उसी पर अपनी प्रतिक्रिया कोट के रूप अलग अलग वेबसाइट पर चस्पा कर देता हूँ इस उम्मीद के साथ= शायद किसी की अन्तरात्मा को जगा सकूं। हिंदी भाषा आज सिर्फ भारत तक ही सीमित न समस्त संसार मे फैल रही है मगर यह दुनियाभर में संवाद कायम करने मे असफल है इंग्लिश ही ऐसा करने सफल हैं